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अश्विनी चौधरी के निर्देशन का करिश्मा

 

 नई दिल्ली: कानून के हाथ लंबे होते हैं, ये सिर्फ एक जुमला भर हो सकता है लेकिन कानून को पृष्ठभूमि में रखकर मानवीय संवेदनाओं की चौहद्दी नापती कहानियां हर समय अपना असर छोड़ती रही हैं। ओटीटी पर ऐसी कहानियों की मांग खूब होती है। हर ओटीटी के पास अपना अपना कोई न कोई लीगल शो है, लेकिन वूट इस मामले में थोड़ा अलग है क्योंकि इसके शो का नाम ही ‘इललीगल’ है। वेब सीरीज ‘इललीगल’ का दूसरा सीजन गुरुवार को रिलीज हो चुका है। और, शो के नैन नक्श बताते हैं कि वूट सेलेक्ट को आखिरकार अपनी किसी सीरीज में वह स्तर हासिल हो चुका है जिसकी कमी उसके अधिकतर शोज में महसूस की जाती रही है। अपनी पहली ही फिल्म में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाले निर्देशक अश्विनी चौधरी ने इस बार ‘इललीगल’ के दूसरे सीजन के निर्देशन का जिम्मा संभाला है और उनके निर्देशन की छाप इस सीरीज के हर एपीसोड पर साफ नजर आती है। हिंदी सिनेमा के काबिल निर्देशकों में शुमार अश्विनी ने एक पेशेगत दुश्मनी में इंसानी जज्बात घोलकर कानून की पृष्ठभूमि में ऐसा कैनवास खींचा है, जिस पर पड़े काले सफेद रंगों के छींटे भी इंद्रधनुषी लगने लगे हैं।

 वेब सीरीज ‘इललीगल’ का दूसरा सीजन शुरुआत से ही कहानी का विस्तार दिखा देता है। दिल्ली के राजपथ पर भागती निहारिका और देश चलाने वाले इलाके में दिखा जेटली अपने अपने किरदारों के भूगोल के साथ साथ उनका मनोविज्ञान भी दर्शकों के सामने स्थापित करने में सफल रहते हैं। कहानी एक वकील के राजनीति में आने और इस दौरान अपने पेश में टक्कर दे सकने वाले वकील की निजी और पेशेगत जिंदगी में रायता फैलाने वाले बांसों पर खिचें तार पर संतुलन बनाए रखने की है। बेटा यहां बाप से बढ़कर है। और अपने भरोसेमंद सिपहसालार की बेइज्जती करके अपने बेटे को अपनी कंपनी की कमान संभालने वाला बाप पहले फ्रेम से काइयां दिखता है। कहानी में दिलचस्प कानूनी पेंच हैं। 

 

अश्विनी चौधरी ‘इललीगल’ के दूसरे सीजन के उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट) हैं। किरदार वहीं हैं, कलाकार भी अधिकतर वहीं हैं, बस निर्देशक का नजरिया बदल जाने से एक औसत सीरीज कैसे एक दमदार सीरीज में तब्दील हो सकती है, ‘इललीगल’ का दूसरा सीजन इसका सही उदाहरण है। अश्विनी के निर्देशन में दर्शकों को किरदारों को पहले दूर से देखने की आदत लगती है और जैसे जैसे एहसास दर्शकों के दिल से जुड़ने शुरू होते हैं, वह दर्शकों को कहानी का हिस्सा इतने आहिस्ता से बनाते हैं कि खुद दर्शक को पता ही नहीं चलता। उनके निर्देशन में एक काल्पनिक कथा में असलियत की प्रतिक्रियाओं को जोड़ लेने की अनोखी क्षमता शुरू से रही है। इन दिनों कारगिल की कहानियों का बहुत शोर है लेकिन अश्विनी की बनाई ‘धूप’ अब भी इन सारी फिल्मों पर भारी है। वह बागी फिल्ममेकर हैं 

 


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