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कोरोना वैक्सीन को लेकर क्यों आपस में भिड़ गए हैं यूरोप के देश?

एक तरफ जहां कोरोना महामारी दुनिया भर में तेजी से वापसी कर रही है वहीं वैक्सीनेशन को तेज करने की जरूरत भी एक्सपर्ट बता रहे हैं. दुनिया के कई देश ऐसे भी हैं जहां अभी तक कोरोना वैक्सीन की एक भी डोज नहीं पहुंची है वहीं कई देशों में भारत समेत कुछ देशों की भेजी वैक्सीन से टीकाकरण शुरू हुआ है लेकिन अभी भी बड़ी तादाद में लोगों को वैक्सीन का इंतजार है ताकि महामारी से सुरक्षा को मजबूत किया जा सके. लेकिन इन सबके बीच कोरोना की वैक्सीन को लेकर यूरोप के देशों में अलग ही जंग का नजारा देखने को मिल रहा है.

ऑक्सफोर्ड द्वारा तैयार एस्ट्राजेनका की वैक्सीन को लेकर विवाद यूरोपीय यूनियन के देशों और ब्रिटेन के बीच बढ़ता जा रहा है. बल्कि यूरोपीय यूनियन ने ब्रिटेन को धमकी तक दे डाली है कि अगर एस्ट्राजेनका की वैक्सीन की उसे सप्लाई शुरू नहीं हुई तो ब्रिटेन में बनी वैक्सीन पर बैन लगाया जा सकता है.

यूरोपीय यूनियन की चीफ उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने साफ तौर पर चेतावनी दी कि अगर एस्ट्रेजनका कंपनी वैक्सीन को लेकर किए गए कॉन्ट्रैक्ट का पालन नहीं करती तो उसकी वैक्सीन के निर्यात पर बैन का फैसला करना पड़ेगा. 28 देशों के संगठन यूरोपीय यूनियन से हाल ही में ब्रिटेन ने अलग होने का फैसला किया था. आयात और निर्यात को लेकर तमाम मुद्दों पर अभी विवाद जारी ही है कि कोरोना वैक्सीन के विवाद ने तनाव को और बढ़ा दिया है. यूरोपीय यूनियन की चीफ ने एस्ट्राजेनका को साफ तौर पर कहा है कि यूरोपीय संघ के देशों से वैक्सीन को लेकर किए गए डील के मुताबिक वैक्सीन की सप्लाई दुनिया के बाकी देशों से पहले उन्हें करें वरना कड़ी कार्रवाई के लिए तैयार रहें.

क्या है विवाद का कारण?
ये चेतावनी उस समय आई है जब यूरोपीय यूनियन के अधिकांश देशों में कोरोना महामारी की तीसरी लहर तेजी पकड़ रही है और मरीजों की संख्या रोज बढ़ रही है. ऐसे में वैक्सीनेशन के लिए सप्लाई की काफी कमी का सामना इन देशों को करना पड़ रहा है. यूरोपीय यूनियन की चीफ का कहना है कि एस्ट्राजेनका ने हमारे देशों को इस साल की पहली तिमाही में 90 मिलियन वैक्सीन डोज सप्लाई करने का वादा किया था जबकि सप्लाई इसके सिर्फ 30 फीसदी का ही किया है. कंपनी इसका कारण ईयू के प्लांट में स्लो उत्पादन को बता रही है. जबकि ईयू के अधिकारियों का कहना है कि जब ब्रिटेन को डील के मुताबिक सप्लाई जारी है तो हमारे देशों को कम सप्लाई क्यों?

यूरोपीय यूनियन की चीफ उर्सुला वॉन डेर लेयेन का कहना है कि- 'डील के मुताबिक यूरोपीय यूनियन को सप्लाई करने के लिए वैक्सीन का उत्पादन यूरोपीय यूनियन और ब्रिटेन दोनों जगहों पर किया जाना था. ईयू के इलाके में तैयार 41 मिलियन डोज यहां से 33 देशों में भेजी जा चुकी है. यहां से बन रही वैक्सीन की सप्लाई ब्रिटेन को भी हो रही है लेकिन वहां से हमें बदले में कुछ भी नहीं मिल रहा. यहां वैक्सीन की कमी से जूझ़ रहे अपने लोगों को हम क्या समझाएं? हमारे पास अब यहां एस्ट्रेजेनेका की बन रही वैक्सीन के निर्यात पर बैन लगाने के अलावा कोई और उपाय नहीं है.'

एक्शन से अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ने की आशंका
ब्रिटेन को छोड़कर यूरोप के बाकी देशों में चिंता का कारण वैक्सीन सप्लाई में अंतर भी है. ब्रिटेन में वैक्सीनेशन का अभियान काफी तेजी से चल रहा है लेकिन यूरोपीय यूनियन के कई देशों में काफी स्लो रफ्तार लोगों की चिंता बढ़ा रही है. इटली का ही उदाहरण लीजिए. इटली में कोरोना के डेली केस 23-24 हजार के आसपास सामने आ रहे हैं. जबकि जर्मनी में कोरोना के मरीज रोज 5 हजार के करीब आ रहे हैं. इन देशों में मरीज बढ़ते जा रहे हैं जबकि वैक्सीन सप्लाई में कमी के कारण वैक्सीनेशन स्लो है. ऐसे में इटली ने ऑस्ट्रेलिया के लिए जाने वाली एस्ट्राजेनका की 2 लाख 50 हजार डोज की शिपमेंट पर इमरजेंसी अधिकारों का इस्तेमाल कर रोक लगा दी और इसका कारण बताया 'शॉर्टेज और सप्लाई में देरी' को.

हालांकि, ईयू के सभी देश वैक्सीन सप्लाई पर बैन के पक्षधर नहीं हैं. बेल्जियम और नीदरलैंड ने बैन पर सतर्क रहने को कहा है क्योंकि इससे कोरोना से जूझ रहे दुनिया के बाकी हिस्सों में वैक्सीन सप्लाई बाधित होने की आशंका है.

ब्रिटेन में क्या कोरोना केस और वैक्सीनेशन का अनुपात?
ब्रिटेन में अब तक वयस्क आबादी यानी 18 साल से अधिक उम्र की कुल आबादी के आधे हिस्से को वैक्सीन की एक डोज लग चुकी है. 8 दिसंबर से ब्रिटेन में शुरू हुए वैक्सीनेशन अभियान के तहत अब तक करीब 2 करोड़ 68 लाख लोगों को वैक्सीन की पहली डोज लग चुकी है. जबकि 21 लाख से अधिक लोगों को वैक्सीन की दूसरी डोज भी लग चुकी है. ब्रिटेन में एस्ट्राजेनका की वैक्सीन के अलावा फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीन भी लोगों को लगाई जा रही है. इसके अलावा नॉर्थ-ईस्ट इंग्लैंड के कुछ हिस्सों में नोवैक्स की वैक्सीन को भी मंजूरी मिली है जबकि जॉनसन एंड जॉनसन की सिंगल डोज वैक्सीन को भी प्रभावी पाया गया है और जल्द ही इसके इस्तेमाल को भी मंजूरी मिल सकती है. ब्रिटेन में अबतक 42 लाख कोरोना के केस सामने आ चुके हैं और अब भी रोज 5000 से अधिक मरीज रोज सामने आ रहे हैं. हाल के दिनों में कोरोना के नए वेरिएंट और तीसरी लहर ने इस संकट को फिर से वापस करा दिया है.

यूरोप के बाकी देशों में क्या है हालात?
वहीं इटली में गुरुवार यानी 18 मार्च तक के आंकड़ों के अनुसार अबतक 75 लाख डोज लोगों को दिए गए हैं, जिनमें से 23 लाख लोगों को दोनों डोज लग चुकी है. ये देश की आबादी का कुल 3.94 फीसदी ही हैं. जबकि जर्मनी में 1 करोड़ 3 लाख डोज अबतक लग चुकी है. जिनमें से 31 लाख लोगों को दो डोज लगी है. ये देश की कुल आबादी का सिर्फ 3.82 फीसदी ही है.

ब्लड क्लॉटिंग विवाद से भी बढ़ा तनाव
इससे पहले एस्ट्राजेनका की वैक्सीन को लेकर पिछले हफ्ते अलग बवाल हुआ था जब यूरोप के 10 से अधिक देशों ने इस वैक्सीन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी ये कहते हु्ए कि कई जगह ब्लड क्लॉटिंग की शिकायतें आई हैं. हालांकि, बाद में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे सेफ बताया और यूरोपीय संघ के ड्रग्स कंट्रोल अथॉरिटी ने भी इसे इस्तेमाल के लिए सेफ बताया तब वैक्सीनेशन फिर से इन देशों में बहाल हो सकी है.

इस वैक्सीन का भारत से क्या है कनेक्शन?
एस्ट्राजेनका की जिस वैक्सीन पर विवाद हो रहा है वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की शोध के बाद तैयार हुई है. जिसका उत्पादन ब्रिटेन और यूरोप में ब्रिटिश-स्वीडिश कंपनी एस्ट्राजेनका कर रही है जबकि भारत में इस वैक्सीन का उत्पादन सीरम इंस्टीट्यूट कोविशील्ड नाम से कर रही है. भारत से ये वैक्सीन 70 से अधिक देशों में सप्लाई हो चुकी है जबकि देश में भी 4 करोड़ से अधिक लोगों को इस वैक्सीन की डोज लगाई जा चुकी है.

पेटेंट को लेकर अमीर और गरीब देश आमने-सामने
वैक्सीन को लेकर दूसरी लड़ाई भी इस बीच जारी है गरीब और अमीर देशों में. गरीब देश डब्ल्यूएचओ पहुंचे हैं कि उनके यहां वैक्सीन उत्पादन का काम काफी पीछे है और अमीर देशों ने बड़ी कंपनियों की डोज पहले ही बुक कर रखी है जिस कारण उनके यहां महामारी से लड़ने का काम बाधित हो रहा है. इसके लिए पेटेंट का सिस्टम बदला जाए ताकि उनके अपने देशों में ही वैक्सीन का उत्पादन बढ़ाया जा सके.

लेकिन डब्ल्यूएचओ के पास पहुंचे इस प्रस्ताव के विरोध में अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के देश खड़े हो गए हैं. ब्रिटेन जैसे देशों का तर्क है कि वैक्सीन के डेवलपमेंट और इसके स्टोरेज के लिए काफी आधुनिक तकनीक की जरूरत है और इनके विकास के बिना छूट देना सुरक्षित नहीं होगा. ब्रिटेन का कहना है कि इस वैश्विक हालात में वैक्सीन सप्लाई के जरिए वे बाकी देशों की मदद कर रहे हैं लेकिन पेटेंट नियमों में छूट का कदम संभव नहीं है. 


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