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साहित्य :
'कभी-कभी बुरा होना ही ठीक है', सिखाती है रिश्तों के ताने बाने की ये कहानी

'ऐसा अक्सर होता है कि हम और आप अपनी कहानी को जीते हुए उसे चाहकर भी नया मोड़ नहीं दे पाते. हम जब अपने आसपास के क‍िरदारों के साथ जी रहे होते हैं तो उनसे पूर्ण संवाद में होते हैं. उनसे हर तरह से कनविंस्ड होते हैं, उनसे हमारे इमोशंस इस कदर जुड़ जाते हैं कि हम चाहकर भी कड़े फैसले नहीं ले पाते. कई बार सबकुछ शीशे की तरह साफ होते हुए भी कुछ फैसले हम अपने दिल और जज्बातों की हिफाजत के लिए ले रहे होते हैं.'

मैं मनुष्य नहीं हूं अब... एसआर हरनोट की 7 कविताएं

'एसआर हरनोट की कविताओं में प्रकृति बिहसती है, खिलखिलाती है और अतीत आपको अपनी जड़ों की ओर खींचता है. रिश्ते जी उठते हैं और समय जैसे ठहर सा जाता है. संवेदनाएं कुंलाचे मारते हुए आपको उन यादों में ले जाती हैं कि अगर आप भावुक हुए, तो आंखों का बहता खारा पानी आपके आसपास की जमीन को भी समंदर कर सकता है. '

यह समय और नन्दकिशोर आचार्य की कविता 'मरण-वक्तव्य'

'नंदकिशोर आचार्य, एक धीर-गंभीर और नितांत अराजनीतिक कवि. हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ चिन्तक साहित्यकार. मरुधरा की सौम्य लय के साथ कृष्ण की तरह बांसुरी बजाने वाले सात्विक कवि. मेरे इस प्रिय कवि ने सुदर्शन चक्र तो नहीं उठाया; लेकिन इस समय मानो वे सीधे शिव की मुद्रा में आ गए हैं. '

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